हनीमून ..  

Posted by: ranjana bhatia in ,

कल तुझे सैर करवाएंगे समन्दर से लगी गोल सड़क की
रात को हार सा लगता है समन्दर के गले में !

घोड़ा गाडी पे बहुत दूर तलक सैर करेंगे
धोडों की टापों से लगता है कि कुछ देर के राजा है हम !

गेटवे ऑफ इंडिया पे देखेंगे हम ताज महल होटल
जोड़े आते हैं विलायत से हनीमून मनाने ,
तो ठहरते हैं यही पर !

आज की रात तो फुटपाथ पे ईंट रख कर ,
गर्म कर लेते हैं बिरयानी जो ईरानी के होटल से मिली है
और इस रात मना लेंगे "हनीमून" यहीं जीने के नीचे !

सादगी और अपनी ही भाषा में यूँ सरलता से हर बात कह देते हैं गुलजार कि लगता है कोई अपनी ही बात कर
रहा है ..उनकी यह लेखन की सादगी जैसे रूह को छू लेती है ..गुलजार का लिखा आम इंसान का लिखा है सोचा है ..गेट वे ऑफ़ इंडिया पर देखेंगे ताजमहल ...सीधा सा कहना एक सपना आँखों में बुन देता है ..जिस सहजता से वे कहते हैं—‘बहुत बार सोचा यह सिंदूरी रोगन/जहाँ पे खड़ा हूँ/वहीं पे बिछा दूं/यह सूरज के ज़र्रे ज़मीं पर मिले तो/इक और आसमाँ इस ज़मीं पे बिछा दूँ/जहाँ पे मिले, वह जहाँ, जा रहा हूँ/मैं लाने वहीं आसमाँ जा रहा हूँ।’ उसी सरलता से अपनी बात को जाहिर इन पंक्तियों में कर दिया है वही सादगी इस कविता में लगी ..