दोस्तो,
मुझे ये बताते जुए अत्यंत हर्ष हो रहा है की ब्लॉग गुलज़ार नामा के बारे में वेब दुनिया पर एक आलेख लिखा गया है.. गुलज़ार नामा ब्लॉग के लिए ये सम्मान की बात है की विश्व की पहली हिन्दी वेब पोर्टेल 'वेब दुनिया' में इस ब्लॉग को स्थान मिला है.. रवीन्द्र व्यास जी के द्वारा हमे इस बात का सौभाग्य प्राप्त हुआ है.. इस उपलब्धि में श्रेय जाता है 'गुलज़ार नामा' पर लिखने वाले हर योगदानकर्ता का.. इसके पाठको का, टिप्पनीदाताओ का और खुद गुलज़ार साहब का जिन्होने अपनी लेखनी की सीपी से इतने नायाब मोती दिए है की हमे उनके बारे में लिखने का मौका मिला..
मैं एक और बार रवीन्द्र जी को धन्यवाद देना चाहूँगा की उन्होने हमारे इस प्रयास को सफल बनाया..
ये खबर देखने के लिए यहा क्लिक करे
गुलज़ार साहब के ही शब्दो में कहे तो..
'इक बार वक़्त से लम्हा गिरा कही
वाहा दास्तान मिली लम्हा कही नही'
Friday, July 18, 2008
वेब दुनिया की ब्लॉग चर्चा में इस बार 'गुलज़ारनामा'
Posted by कुश एक खूबसूरत ख्याल at 12:20 AM 5 comments
Friday, July 11, 2008
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है !
जिंदगी की भागम भाग और रोजी रोटी की चिंता में न जाने कितने पल यूँ ही बीत जाते हैं ...अपनों का साथ जब कम मिल पाता है तो दिल में उदासी का आलम छा जाता है ..और तब याद आ जाता है वह गाना दिल ढूढता है फ़िर वही फुर्सत के रात दिन बैठे रहें तस्वुर -ऐ -जानां किए हुए ...पर कहाँ मिल पाते हैं वह फुर्सत के पल .. गुलजार जी ने इन्ही पलों को जिंदगी की खर्ची से जब जोड़ दिया तो इतने सुंदर लफ्ज़ बिखरे कागज पर कि लगा कि एक एक शब्द सच है इसका ...
खर्ची .
मुझे खर्ची में पूरा एक दिन हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है ,झपट लेता है ,अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने कि आहट भी नही होती
खरे दिल को भी मैं खोटा समझ कर भूल जाता हूँ !
गिरेबां से पकड़ कर माँगने वाले भी मिलते हैं !
तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है ,
तुझे किश्तें चुकानी है -"
जबरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है ये कह कर
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिए रख ले
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं ,
जब होगा हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं अपने लिए रख लूँ
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है !
Posted by रंजना [रंजू भाटिया] at 10:23 PM 13 comments
Labels: नज़्म
Saturday, July 5, 2008
सोने विच मड के
तुम मिले तो क्यों लगा मुझे
खुद से मुलाकात हो गइ
Zकुछ भी तो कहा नहीं मगर
जिंदगी से बात हो गई
आ न आ साथ बैठेें
जरा दरे तो
हाथ थामें रहें और ुकुछ न कहें
छू के देखो तो आखों की खामोषियों को
कितनी चुपचाप होती हैं सरगोषियां
इन पंक्तियों में दखों तो सही, प्यार की इंतहा , केयर करने की इंतहा
सोने विच मड़़ के मंतर पढ़ा के
लभ के तवीत ल्यावे नी
फड़ फड़ गले च पावे नी
ते नाले पावे जफि्फयां
प्याज कटां या चिठृठी आवे
भर जानण अिक्खयां
पिक्खयां वे पिक्खयां
Posted by Manvinder at 2:30 AM 2 comments
Friday, July 4, 2008
गुलजार के लफ्जों में मानसून ..

गुलजार लफ्जों को कुछ इस तरह से बुन देते हैं कि दिल की तह तक वह लफ्ज़ पहुँच जाते हैं .मानसून को कुछ इस तरह से उन्होंने लफ्जों में बरसाया है ..मानसून वैसे ही आँख मिचोली खेल रहा है शायद गुलजार के लफ्जों से कुछ राहत मिले :)
बारिश आती है तो पानी को भी लग जाते हैं पांव ,
दरो -दीवार से टकरा कर गुजरता है गली से
और उछलता है छपाकों में ,
किसी मैच में जीते हुए लड़को की तरह !
जीत कर आते हैं जब मैच गली के लड़के
जुटे पहने हुए कैनवस के ,
उछलते हुए गेंदों की तरह ,
दरो -दीवार से टकरा के गुजरते हैं
वो पानी के छपाकों की तरह !
Posted by रंजना [रंजू भाटिया] at 5:24 AM 7 comments
Labels: नज़्म
Monday, June 23, 2008
लबों से चूम लो
गुलज़ार साहब के बेहतरीन अंदाज़ को, उतने ही बेहतरीन संगीत और आवाज़ से सजाया गया है इस गीत को!!
इस सब के साथ सोने पर सुहागा, रेखा... बेहद खूबसूरत बिल्कुल इस गीत जैसी...
और इस सब के साथ भी कहीं कमी थी तो पूरी हो गयी खुद गुलज़ार साहब की आवाज़ से....
लबों से चूम लो, आखों से थाम लो मुझको
तुम्ही से जन्मूँ तो शायद मुझे पनाह मिले
दो सोंधे सोंधे से जिस्म ,
जिस वक़्त एक मुट्ठी में सो रहे थे
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था?
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी?
मैं आरज़ू की तपिश में पिघल रही थी कहीं
तुम्हारे जिस्म से होकर निकल रही थी कहीं
बड़े हसीन थे जो राह में गुनाह मिले
तुम्ही से जन्मूँ तो शायद .....
तुम्हारी लौ को पकड़ कर जलने की आरज़ू में
जब अपने ही आप से लिपट कर सुलग रहा था
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था?
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी?
तुम्हारी आखों के साहिल से दूर दूर कहीं
मैं ढूँढती थी मिले खुश्बुओं का नूर कहीं
वहीं रुकी हूँ जहाँ से तुम्हारी राह मिले
तुम्ही से जन्मूँ तो शायद....
फिल्म - आस्था
संगीत - सारंगदेव
गायिका - श्री राधा बनरजी
Posted by manishi... at 10:41 AM 7 comments
Labels: फिल्मी गीत
Saturday, June 21, 2008
किताबे झांकती है बंद अलमारी के शीशों से
कंप्युटर युग है .हाथ से किताब ,डायरी -पेन का रिश्ता एक दास्तान एक किस्सा बनता जा रहा है धीरे धीरे ..कभी कुछ कोंधा जहन में तो फट से कहीं लिख लिया करते थे ..और अब लगता है कि की -बोर्ड पर लिखो प्रिंट आउट ले लो .इ बुक खोलो और पढ़ लो. ..किताबे सिर्फ़ इल्म का जरिए नही मुलाकात का बहाना भी थी ..दिल का सकून और सूखे हुए गुलाब के फूलो की इश्क की दास्तान भी ... इसी बात को गुलजार जी ने देखिये कितनी खूबसूरती से अपनी इक नज्म में ढाला है .किताब से जुड़ी हर बात उन्होंने इस नज्म में कही है ...
किताबे झांकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है
महीनों अब मुलाकाते नही होती
जो शामें इनकी सोहबत में कटा करती थी अब अक्सर
गुजर जाती है कंप्युटर के परदों पर
बड़ी बेचैन रहती है किताबे ....
इन्हे अब नींद में चलने की आदत हो गई है
बड़ी हसरत से तकती है ..
जो कदरें वो सुनाती थी
की जिन के सैल कभी मरते थे
वो कदरें अब नज़र आती नही घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थी
वह सारे उधडे उधडे हैं
कोई सफहा पलटता हूँ तो एक सिसकी निकलती है
कई लफ्जों के माने गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंडे लगते हैं वो सब अल्फाज़
जिन पर अब कोई माने नही उगते
बहुत सी इसतलाहें हैं
जो मिटटी के सिकूरों की तरह बिखरी पड़ी है
गिलासों ने उन्हें मतरुक कर डाला
जुबान पर जायका आता था जो सफहे पलटने का
अब उंगली क्लिक करने से बस इक झपकी गुजरती है
बहुत कुछ तह बा तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती राब्ता था ,कट गया है
कभी सीने पर रख कर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे ,छुते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने ,गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!
Posted by रंजना [रंजू भाटिया] at 3:04 AM 2 comments
Wednesday, June 18, 2008
रूह देखी है ,कभी रूह को महसूस किया है ?
गुलजार का लेखन क्यूँ इतना दिल के करीब लगता है ..क्यूंकि वह आम भाषा में लिखा होता है ..रूह से लिखा हुआ ..उनकी लिखी एक नज्म कितना कुछ कह जाती हैं ...
रूह देखी है कभी रूह को महसूस किया है ?
जागते जीते हुए दुधिया कोहरे से लिपट कर
साँस लेते हुए इस कोहरे को महसूस किया है ?
या शिकारे में किसी झील पे जब रात बसर हो
और पानी के छपाकों में बजा करती हूँ ट लियाँ
सुबकियां लेती हवाओं के वह बेन सुने हैं ?
चोदहवीं रात के बर्फाब से इस चाँद को जब
ढेर से साए पकड़ने के लिए भागते हैं
तुमने साहिल पे खड़े गिरजे की दीवार से लग कर
अपनी गहनाती हुई कोख को महसूस किया है ?
जिस्म सौ बार जले फ़िर वही मिटटी का ढेला
रूह एक बार जेलेगी तो वह कुंदन होगी
रूह देखी है ,कभी रूह को महसूस किया है ?
Posted by रंजना [रंजू भाटिया] at 6:39 AM 4 comments

