वेब दुनिया की ब्लॉग चर्चा में इस बार 'गुलज़ारनामा'  

Posted by: कुश

दोस्तो,
मुझे ये बताते जुए अत्यंत हर्ष हो रहा है की ब्लॉग गुलज़ार नामा के बारे में वेब दुनिया पर एक आलेख लिखा गया है.. गुलज़ार नामा ब्लॉग के लिए ये सम्मान की बात है की विश्व की पहली हिन्दी वेब पोर्टेल 'वेब दुनिया' में इस ब्लॉग को स्थान मिला है.. रवीन्द्र व्यास जी के द्वारा हमे इस बात का सौभाग्य प्राप्त हुआ है.. इस उपलब्धि में श्रेय जाता है 'गुलज़ार नामा' पर लिखने वाले हर योगदानकर्ता का.. इसके पाठको का, टिप्पनीदाताओ का और खुद गुलज़ार साहब का जिन्होने अपनी लेखनी की सीपी से इतने नायाब मोती दिए है की हमे उनके बारे में लिखने का मौका मिला..

मैं एक और बार रवीन्द्र जी को धन्यवाद देना चाहूँगा की उन्होने हमारे इस प्रयास को सफल बनाया..

ये खबर देखने के लिए यहा क्लिक करे


गुलज़ार साहब के ही शब्दो में कहे तो..

'इक बार वक़्त से लम्हा गिरा कही
वाहा दास्तान मिली लम्हा कही नही'

तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है !  

Posted by: ranjana bhatia in

जिंदगी की भागम भाग और रोजी रोटी की चिंता में न जाने कितने पल यूँ ही बीत जाते हैं ...अपनों का साथ जब कम मिल पाता है तो दिल में उदासी का आलम छा जाता है ..और तब याद आ जाता है वह गाना दिल ढूढता है फ़िर वही फुर्सत के रात दिन बैठे रहें तस्वुर -ऐ -जानां किए हुए ...पर कहाँ मिल पाते हैं वह फुर्सत के पल .. गुलजार जी ने इन्ही पलों को जिंदगी की खर्ची से जब जोड़ दिया तो इतने सुंदर लफ्ज़ बिखरे कागज पर कि लगा कि एक एक शब्द सच है इसका ...

खर्ची .

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है ,झपट लेता है ,अंटी से


कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने कि आहट भी नही होती
खरे दिल को भी मैं खोटा समझ कर भूल जाता हूँ !

गिरेबां से पकड़ कर माँगने वाले भी मिलते हैं !
तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है ,
तुझे किश्तें चुकानी है -"

जबरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है ये कह कर
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिए रख ले
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं ,
जब होगा हिसाब होगा

बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं अपने लिए रख लूँ
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है !

सोने विच मड के  

Posted by: Manvinder


सुबह की ताजगी हो, रात की चांदनी हो, सांझ की झुरमुट हो या सूरज का ताप, उन्हें खूबसूरती से अपने लफ्जों में पिरो कर किसी भी रंग में रंगने का हुनर तो बस गुलजार साहब को ही आता है। मुहावरों के नये प्रयोग अपने आप खुलने लगते हैं उनकी कलम से। बात चाहे रस की हो या गंध की, उनके पास जा कर सभी अपना वजूद भूल कर उनके हो जाते हैं और उनकी लेखनी में रचबस जाते है। यादों और सच को वे एक नया रूप दे देते है। उदासी की बात चलती है तो बीहड़ों में उतर जाते हैं, बर्फीली पहािड़यों में रम जाते हैं। रिष्तों की बात हो वे जुलाहे से भी साझा हो जाते हैं। दिल में उठने वाले तूफान, आवेग, सुख, दुख, इच्छाएं, अनुभूतियां सब उनकी लेखनी से चल कर ऐसे आ जाते हैं जैसे कि वे हमारे पास की ही बातें हो। जैसे कि बस हमारा दुख है, हमारा सुख है। क्या क्या कहें जैसे
तुम मिले तो क्यों लगा मुझे
खुद से मुलाकात हो गइ
Zकुछ भी तो कहा नहीं मगर
जिंदगी से बात हो गई
आ न आ साथ बैठेें
जरा दरे तो
हाथ थामें रहें और ुकुछ न कहें
छू के देखो तो आखों की खामोषियों को
कितनी चुपचाप होती हैं सरगोषियां

इन पंक्तियों में दखों तो सही, प्यार की इंतहा , केयर करने की इंतहा
सोने विच मड़़ के मंतर पढ़ा के
लभ के तवीत ल्यावे नी
फड़ फड़ गले च पावे नी
ते नाले पावे जफि्फयां
प्याज कटां या चिठृठी आवे
भर जानण अिक्खयां
पिक्खयां वे पिक्खयां

गुलजार के लफ्जों में मानसून ..  

Posted by: ranjana bhatia in




गुलजार लफ्जों को कुछ इस तरह से बुन देते हैं कि दिल की तह तक वह लफ्ज़ पहुँच जाते हैं .मानसून को कुछ इस तरह से उन्होंने लफ्जों में बरसाया है ..मानसून वैसे ही आँख मिचोली खेल रहा है शायद गुलजार के लफ्जों से कुछ राहत मिले :)


बारिश आती है तो पानी को भी लग जाते हैं पांव ,
दरो -दीवार से टकरा कर गुजरता है गली से
और उछलता है छपाकों में ,
किसी मैच में जीते हुए लड़को की तरह !

जीत कर आते हैं जब मैच गली के लड़के
जुटे पहने हुए कैनवस के ,
उछलते हुए गेंदों की तरह ,
दरो -दीवार से टकरा के गुजरते हैं
वो पानी के छपाकों की तरह !

लबों से चूम लो  

Posted by: manishi... in

गुलज़ार साहब के बेहतरीन अंदाज़ को, उतने ही बेहतरीन संगीत और आवाज़ से सजाया गया है इस गीत को!!
इस सब के साथ सोने पर सुहागा, रेखा... बेहद खूबसूरत बिल्कुल इस गीत जैसी...
और इस सब के साथ भी कहीं कमी थी तो पूरी हो गयी खुद गुलज़ार साहब की आवाज़ से....

लबों
से चूम लो, आखों से थाम लो मुझको
तुम्ही से जन्मूँ तो शायद मुझे पनाह मिले

दो सोंधे सोंधे से जिस्म ,
जिस वक़्त एक मुट्ठी में सो रहे थे
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था?
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी?

मैं आरज़ू की तपिश में पिघल रही थी कहीं
तुम्हारे जिस्म से होकर निकल रही थी कहीं
बड़े हसीन थे जो राह में गुनाह मिले
तुम्ही से जन्मूँ तो शायद .....

तुम्हारी लौ को पकड़ कर जलने की आरज़ू में
जब अपने ही आप से लिपट कर सुलग रहा था
बता तो उस वक़्त मैं कहाँ था?
बता तो उस वक़्त तू कहाँ थी?

तुम्हारी आखों के साहिल से दूर दूर कहीं
मैं ढूँढती थी मिले खुश्बुओं का नूर कहीं
वहीं रुकी हूँ जहाँ से तुम्हारी राह मिले
तुम्ही से जन्मूँ तो शायद....



फिल्म - आस्था
संगीत - सारंगदेव
गायिका - श्री राधा बनरजी

किताबे झांकती है बंद अलमारी के शीशों से  

Posted by: ranjana bhatia

कंप्युटर युग है .हाथ से किताब ,डायरी -पेन का रिश्ता एक दास्तान एक किस्सा बनता जा रहा है धीरे धीरे ..कभी कुछ कोंधा जहन में तो फट से कहीं लिख लिया करते थे ..और अब लगता है कि की -बोर्ड पर लिखो प्रिंट आउट ले लो .इ बुक खोलो और पढ़ लो. ..किताबे सिर्फ़ इल्म का जरिए नही मुलाकात का बहाना भी थी ..दिल का सकून और सूखे हुए गुलाब के फूलो की इश्क की दास्तान भी ... इसी बात को गुलजार जी ने देखिये कितनी खूबसूरती से अपनी इक नज्म में ढाला है .किताब से जुड़ी हर बात उन्होंने इस नज्म में कही है ...

किताबे झांकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है
महीनों अब मुलाकाते नही होती
जो शामें इनकी सोहबत में कटा करती थी अब अक्सर
गुजर जाती है कंप्युटर के परदों पर
बड़ी बेचैन रहती है किताबे ....
इन्हे अब नींद में चलने की आदत हो गई है
बड़ी हसरत से तकती है ..

जो कदरें वो सुनाती थी
की जिन के सैल कभी मरते थे
वो कदरें अब नज़र आती नही घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थी
वह सारे उधडे उधडे हैं
कोई सफहा पलटता हूँ तो एक सिसकी निकलती है
कई लफ्जों के माने गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंडे लगते हैं वो सब अल्फाज़
जिन पर अब कोई माने नही उगते
बहुत सी इसतलाहें हैं
जो मिटटी के सिकूरों की तरह बिखरी पड़ी है
गिलासों ने उन्हें मतरुक कर डाला

जुबान पर जायका आता था जो सफहे पलटने का
अब उंगली क्लिक करने से बस इक झपकी गुजरती है
बहुत कुछ तह बा तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती राब्ता था ,कट गया है
कभी सीने पर रख कर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे ,छुते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने ,गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!

रूह देखी है ,कभी रूह को महसूस किया है ?  

Posted by: ranjana bhatia

गुलजार का लेखन क्यूँ इतना दिल के करीब लगता है ..क्यूंकि वह आम भाषा में लिखा होता है ..रूह से लिखा हुआ ..उनकी लिखी एक नज्म कितना कुछ कह जाती हैं ...

रूह देखी है कभी रूह को महसूस किया है ?
जागते जीते हुए दुधिया कोहरे से लिपट कर
साँस लेते हुए इस कोहरे को महसूस किया है ?

या शिकारे में किसी झील पे जब रात बसर हो
और पानी के छपाकों में बजा करती हूँ ट लियाँ
सुबकियां लेती हवाओं के वह बेन सुने हैं ?

चोदहवीं रात के बर्फाब से इस चाँद को जब
ढेर से साए पकड़ने के लिए भागते हैं
तुमने साहिल पे खड़े गिरजे की दीवार से लग कर
अपनी गहनाती हुई कोख को महसूस किया है ?

जिस्म सौ बार जले फ़िर वही मिटटी का ढेला
रूह एक बार जेलेगी तो वह कुंदन होगी

रूह देखी है ,कभी रूह को महसूस किया है ?

गुलज़ार साहब का लिखा एक और दिलकश गीत  

Posted by: कुश in

आइए आज सुनते है गुलज़ार साहब का लिखा एक और बेहतरीन गीत.. फिल्म है 'झूम बराबर झूम' हालाँकि शाद अली की पिछली दो फ़िल्मे जिनके गीत गुलज़ार साहब ने लिखे थे, 'साथिया' और 'बंटी और बबली' के गीत बहुत हिट हुए थे.. पर 'झूम बराबर झूम' के संगीत ने निराश किया.. मगर गुलज़ार साहब वहा भी अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे.. मसलन इस फिल्म का टाइटल सॉंग कुछ यू शुरू होता है..

ओ बीच बाज़ारी दंगे लग गये, दो तल्वारी अखियों के, मखना..
ओ जान कटे के जिगर कटे अब इन दो धारी अखियों से, मखना...

आज चाँदनी कुटेंगे
आसमान को लूटेंगे..
चल धुआ उड़ा के झूम...

इसी गीत में कुछ पंक्तिया तो कमाल लिखी है गुलज़ार साहब ने जैसे देखिए..

यह चाँद का चिकना साबुन कुछ देर में गल जाएगा ...

अब ये देखिए क्या ग़ज़ब ढाया है गुलज़ार साहब ने..
मकई की रोटी गूड रख के, मिसरी से मीठे लब चख के
तंदूर जलाके झूम झूम....

अब बताइए तंदूर जलाके भी झूमने की बात की जा रही है.. कहने का मतलब है की रोज़मर्रा के जो शब्द है.. उन्हे भी कितनी खूबसूरती से पिरोया है..गुलज़ार साहब ने..

खैर मैं बात करता हू उस गाने की जो मैं आज आपको सुनाने जा रहा हू.. ये गीत भी इसी फिल्म का है 'बोल ना हल्के हल्के' पूरी फिल्म में यही एक गीत संपूर्ण नज़र आता है इसलिए इसके बोल के साथ साथ में यहा वीडियो भी दे रहा हू.. क्योंकि जीतने अच्छे बोल लिखे है गुलज़ार साहब ने शंकर-एहसान- लॉय ने भी पूरी सिद्दत से इसमे संगीत दिया है.. और उतनी मधुरता घोली है राहत फ़तेह अली ख़ान और महालक्ष्मी अय्यर ने अपनी आवाज़ देकर.. और शाद अली ने भी इस गीत को बहुत ही सुंदर तरीके से फिल्माया है.. अब मैं कितना सही हू.. ये तो आप ये गाना देखकर ही बताइए...




धागे तोड़ लाओ चांदनी से नूर के
घूंघट ही बना लो रौशनी से नूर के
शरमा गयी तो आगोश में लो
सांसों से उलझी रहें मेरी सांसें

बोल ना हल्के हल्के
बोल ना हल्के हल्के

आ नींद का सौदा करें
इक ख्वाब दें इक ख्वाब लें
इक ख्वाब तो आन्खों में है
इक चांद तेरे तकिये तले

कितने दिनों से ये आसमां भी
सोया नही है, इसको सुला दें

बोल ना हल्के हल्के
बोल ना हल्के हल्के

उम्रे लगी कहते हुये
दो लफ़्ज़ थे एक बात थी
वो इक दिन सौ साल का
सौ साल की वो रात थी

ऐसा लगे जो चुपचाप दोनों
पल पल में पूरी सदियां बिता दें

बोल ना हल्के हल्के
बोल ना हल्के हल्के

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गुलज़ार साहब की नज्मों में sound का कमाल  

Posted by: Piyush k Mishra

आइए आज बात करते हैं गुलज़ार साब के गीतों में साउंड के कमाल की.अक्सर कई गीतों में गुलज़ार साब ने ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो श्रोता को चकित कर देते हैं.जैसे की उन्होने कोई जाल बुना हो और हम उसमें बहुत आसानी से फँस जाते हैं.दो अलग अलग शब्द जिनका साउंड बिल्कुल एक तरह होता है और वो प्रयोग भी इस तरह किए जा सकते हैं की कुछ अच्छा ही अर्थ निकले गीत का...गुलज़ार साब ने अक्सर ही ऐसा किया है.इसे हम गुलज़ार का तिलिस्म भी कह सकते हैं.

अब खट्टा मीठा फिल्म के एक गीत को लीजिए जिसमें वो कहते हैं-
तुमसे मिला था प्यार अच्छे नसीब थे
हम उन दिनों अमीर थे जब तुम करीब थे

चलते फिरते अगर ये गीत सुना जाए तो कोई आश्चर्या नहीं होगा की करीब को ग़रीब सुन लिया जाए.ये ज़रूर है की इसका अर्थ थोड़ा कमज़ोर हो जाता है मगर ये तो इंसान की फ़ितरत है की जब अमीर शब्द आता है हम खुद बा खुद मान लेते हैं की अब ग़रीब आएगा और उसी मानसिक स्थिति में करीब को ग़रीब सुन भी लेते हैं.
मरासिम एलबम की एक ग़ज़ल है -

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते.....

इसके बीच एक शेर आता है-
शहड़ जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिए दिल नहीं थोड़ा करते
कितना आसान है दूसरे मिसरे में थोड़ा को तोड़ा सुन लेना.और उसका मतलब भी बिल्कुल सटीक बैठता है.मगर यही जादू है गुलज़ार साब की कलम का.साउंड का कमाल.
इसी एलबम की एक दूसरी ग़ज़ल है-
शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आपकी कमी सी है

इसके बीच एक शेर कुछ यूँ आता है-
कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तसलीम लाजमी सी है
दूसरे मिसरे में ना जाने क्यूँ तसलीम.तस्वीर की तरह सुनाई पड़ता है.और मेघना गुलज़ार,गुलज़ार साब की बेटी ने इसका वीडियो बनाया है उसमें भी बिल्कुल इसी जगह एक तस्वीर दिखाई जाती है.तस्वीर से मतलब बदल ज़रूर जाता है मगर बिगड़ता नहीं.

फिल्म सत्या का एक गीत है-
गीला गीला पानी...पानी सुरीला पानी
नि पा पा नि
साउंड का कितना ज़बरदस्त प्रयोग.चूँकि पात्र एक संगीतकार है तो वो बारिश की बूँदों में भी संगीत ढूँढ लेती है और इस भाव को बहुत सटीक तरीके से बयान किया है गुलज़ार साब ने.सप्तक के सुरों के द्वारा.

फिल्म जान-ए-मन का गीत है-
जाने की जाने ना
माने की माने ना
मन जाने जाने मन
पिया मन जाने ना
अब यहाँ तो कुछ कहने की ज़रूरत भी नहीं.मन जाने-जाने मन.वाह साहब.कमाल है बिल्कुल.

फिल्म झूम बराबर झूम का गीत- टिकट टू हॉलीवुड के बीच में एक पंक्ति आती है-
शहर के उस मोड़ से
जहाँ से तू पास हो
कहे मैं ज़िंदगी भर वहीं पे रूकू

यहाँ का जाल देखिए.दूसरी पंक्ति-जहाँ से तू पास हो..अगर इसे अँग्रेज़ी का पास मानें टू भी मज़ा है और हिन्दी का पास मानें टू भी मज़ा है.एक तीर दो शिकार..गुलज़ार साब की कलम दो धारी तलवार :)

और सबसे बड़ा जादू जो हमेशा सबको चकित करता है वो है फिल्म लेकिन का गीत-यारा सीलि सीलि....
इसके बीच एक पंक्ति आती है-
बाहर उजाड़ा हैं
अंदर वीराना
और ज़्यादातर लोग उजड़ा को उजाला ही सुनते हैं.अर्थ भी सही निकलता है.और मज़े की बात ये की वो सारे वेबसाइट जहाँ गानों के बोल लिखे मिलते हैं वो भी इसे उजाला ही लिखते हैं.

तो ये कमाल है गुलज़ार साब की कलम का.शब्दों के साथ साथ साउंड पर भी इतनी पकड़ है उनकी कि शब्दों के साथ जादू कर देते हैं.और मुझे यक़ीन है कि आपमें से भी कई इस तिलिस्म में फँस चुके होंगे. :)

""कुछ और नज्में ""गुलजार जी की किताब का एक परिचय ..  

Posted by: ranjana bhatia

गुलजार नामा ...यहाँ बात हो रही उस शख्स की जिसका लिखा हर लफ्ज़ लोगो के दिलों में उतर कर बस जाता है ..उनके बारे में एक लेख में मैंने अपने ब्लॉग में लिखा ..यह अब उस से आगे की कड़ी मान ले ..आज यहाँ बात करते हैं उनकी लिखी नज्मों की जो उन्ही की लिखी कुछ और नज्मे नामक किताब से हैं .इस से पहले उनकी एक किताब आई थी एक बूंद चाँद यह किताब वह कहते हैं कि उस से आगे की कड़ी है ..इस किताब में उन्होंने अपनी लिखे को जो नाम दिए हैं वह .. ऊला., सानी ,दस्तखत ,खाके .लम्बी नज्मे और त्रिवेणी
ऊला ,सानी लिया गया है उर्दू की जुबान से यह लिखे गए शेर के दो मिसरे होते हैं जिस में पहले मिसरे को ऊला जो अपनी बात कहता है पर पूरा होता है सानी पर .. उन्ही के लफ्जों में ..इस किताब में ऊला की नज्मे उन मिसरों की तरह है जो अपने दूसरे हिस्से को तलाश करती नज़र आती है ..पर इसको देखने का नजरिया सबका अलग अलग हो सकता है .
दस्तखत हिस्से में उनकी निजी ज़िंदगी से जुड़ी हुई नज्में हैं ..खाके में जो लिखा गया है वह एक पेंटिंग ,पोट्रेट और कुछ कुछ लेंड स्केप की तरह है और उनकी लिखी त्रिवेणी के बारे में कौन नही जानता जिसके पहले दो मिसरे एक शेर की लगते हैं पर तीसरा मिसरा लगते ही उसके मायने बदल जाते हैं ..जैसे ..

इतने लोगो में ,कह दो आंखो को
इतना ऊँचा न ऐसे बोला करे

लोग मेरा नाम जान जाते हैं !!

अब इतने कम लफ्जों में इस से ज्यादा खूबसूरत बात गुलजार जी के अलावा कौन लिख सकता है ...ज़िंदगी के हर रंग को छुआ है उन्होंने अपनी कही नज्मों में गीतों में ...कुदरत के दिए हर रंग को उन्होंने इस तरह अपनी कलम से कागज में उतारा है जो हर किसी को अपना कहा और दिल के करीब लगता है इतना कुदरत से जुडाव बहुत कम रचना कार कर पाये हैं फिल्मों में भी और साहित्य में भी ..उनकी एक नज्म आज ऊला से ..

मैं कायनात में स्ययारों में भटकता था
धुएँ में धूल में उलझी हुई किरण की तरह
मैं इस जमीं पे भटकता रहा हूँ सदियों तक
गिरा है वक्त से कट कर जो लम्हा .उसकी तरह
वतन मिला तो गली के लिए भटकता रहा
गली में घर का निशाँ तलाश करता रहा बरसों
तुम्हारी रूह में अब ,जिस्म में भटकता हूँ

लबों से चूम लो आंखो से थाम लो मुझको
तुम्हारी कोख से जनमू तो फ़िर पनाह मिले ..

किसी मौसम का झोंका था - रेनकोट फ़िल्म से  

Posted by: कुश in

रितुपर्णो घोष की अजय देवगन और ऐश्वर्या राय को लेकर बनाई फिल्म रेनकोट मुझे बेहद पसंद है और इसकी एक खास वजह इसका संगीत भी है.. यू तो रेनकोट फिल्म के सारे गीत खुद रितुपर्णो घोष ने ही लिखे है.. पर इसके एक गाने में गुलज़ार साहब की आवाज़ में उनकी पढ़ी हुई एक नज़्म भी है.. किसी मौसम का झोंका था..

गीत है पिया तोरा कैसा अभिमान... जितने खूबसूरत इसके बोल है उतनी ही मधुरता शुभा मुदगल जी ने इसे गाकर प्रदान की है.. ऋतपर्णो घोष गुलज़ार साहब को 'गुलज़ार भाई' कहते है.. और उनकी खास फरमाइश पर गुलज़ार साहब ने खुद अपनी लिखी नज़्म को अपनी आवाज़ दी है..
आप पढ़िए इस एक और बेजोड़ नज़्म को. और सुनिए खुद गुलज़ार साहब की आवाज़ में..

एक बार सुनने के बाद खुद आपको लगेगा की ये गीत सुन ना आपके लिए कितना ज़रूरी था..



किसी मौसम का झोंका था,
जो इस दीवार पर लटकी हुइ तस्वीर तिरछी कर गया है
गये सावन में ये दीवारें यूँ सीली नहीं थीं
ना जाने इस दफा क्यूँ इनमे सीलन आ गयी है
दरारें पड़ गयी हैं और सीलन इस तरह बैठी है
जैसे खुश्क रुक्सारों पे गीले आसूं चलते हैं

ये बारिश गुनगुनाती थी इसी छत की मुंडेरों पर
ये बारिश गुनगुनाती थी इसी छत की मुंडेरों पर
ये घर कि खिड़कीयों के कांच पर उंगली से लिख जाती थी सन्देशे
देखती रहती है बैठी हुई अब, बंद रोशंदानों के पीछे से

दुपहरें ऐसी लगती हैं, जैसे बिना मोहरों के खाली खाने रखे हैं,
ना कोइ खेलने वाला है बाज़ी, और ना कोई चाल चलता है,

ना दिन होता है अब ना रात होती है, सभी कुछ रुक गया है,
वो क्या मौसम का झोंका था, जो इस दीवार पर लटकी हुइ तस्वीर तिरछी कर गया है

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है - गुलज़ार  

Posted by: कुश in

गुलज़ार साहब की नज़मो की बात करे तो एक से बढ़कर एक मोती मिलेंगे उनके पास.. अगली पोस्ट में हम रेनकोट फिल्म से उनकी नज़्म की चर्चा करेंगे. .पर अभी आपके बीच बाँटना चाहूँगा .. गुलज़ार साहब की लिखी एक रूहानी नज़्म.. अपने महबूब की तारीफ़ इस अंदाज़ में शायद ही किसनी ने की होगी



नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी
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साँस लेना भी कैसी आदत है..- गुलज़ार  

Posted by: कुश in

साँस लेना भी कैसी आदत है.. गुलज़ार साहब की एक और लिखावट.. ज़िंदगी की गहरी सच्चाई कितने कम शब्दो में अपनी इस नज़्म में कही है उन्होने.. ज़रा गौर फरमाइए


साँस लेना भी कैसी आदत है
जीये जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिये जाते हैं, जिये जाते हैं

आदतें भी अजीब होती हैं
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इक जरा छींक ही दो तुम- गुलज़ार  

Posted by: कुश in

पिछली पोस्ट मीं ही मैने बात की थी की किस तरह गुलज़ार साहब भगवान से फरमाते है.. और एक नज़्म का ज़िक्र किया था.. इक ज़रा छींक ही दो तुम.. लीजिए पेश है गुलज़ार साहब की एक बेजोड़ नज़्म....



चिपचिपे दूध से नहलाते हैं
आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुंढाते हैं गिलसियां भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पांव पर पांव लगाये खड़े रहते हो
इक पथरायी सी मुस्कान लिये
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।
जब धुआं देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम,
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

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कुछ त्रिवेणिया- गुलज़ार साहब की आवाज़ में  

Posted by: कुश


ऐसे मौके मैं अक्सर खोजता रहता हू जब गुलज़ार साहब किसी मंच पर नज़र जाए.. ये वीडियो भी बस कही से हाथ लगा तो सोचा यहा शेयर किया जाए.. गुलज़ार साहब खुद अपनी ही लिखी त्रिवेणिया अपनी आवाज़ में सुना रहे है.. साथ ही त्रिवेणी क्या है सुनिए खुद गुलज़ार साहब के शब्दो में....




और गुलज़ार साहब की ये त्रिवेणी मेरे दिल के बहुत करीब है.. देखिए कितनी शिद्दत से बात कही गयी है.. एक भूखे इंसान की बात जिसे चाँद में भी रोटी नज़र आती है.. एक त्रिवेणी में इतनी बड़ी बात गुलज़ार साहब ही कह सकते


मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने

रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे

चाँद गुलज़ार साहब का पसंदीदा शब्द है.. खैर ये त्रिवेणिया जिस किताब में प्रकाशित हुई थी उस किताब का नाम ही 'रात चाँद और में' था.. तो उस में चाँद की ही बातें होगी.. अगली त्रिवेणी में भी रात और चाँद की बात ही कही गयी है.


सारा दिन बैठा,मैं हाथ में लेकर खा़ली कासा
रात जो गुज़री,चांद की कौड़ी डाल गई उसमें

सूदखो़र सूरज कल मुझसे ये भी ले जायेगा।

मानवीय रिश्तो पर गुलज़ार साहब की पकड़ बहुत ही बढ़िया है.. उनकी फिल्म इज़ाज़त ही देख लीजिए.. इस त्रिवेणी में भी रिश्तो की बात कही गयी है आख़िरी लाइन की मासूमियत देखिएगा.. ऐसी बातें ना जाने कहा से छांट छांट के लाते है गुलज़ार साहब..


सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी की
मुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर

कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।

आख़िरी लाइन का रौब अगली त्रिवेणी में भी बरकरार है.. ज़रा गौर फरमाइए


शोला सा गुज़रता है मेरे जिस्म से होकर
किस लौ से उतारा है खुदावंद ने तुम को

तिनकों का मेरा घर है,कभी आओ तो क्या हो?

गुलज़ार साहब की एक नज़्म है.. इक ज़रा छींक ही दो तुम.. बड़ी मासूमियत से भगवान से बात की है उन्होने और इस त्रिवेणी में देखी.. खुदा से किस तरह फ़ार्मा रहे है गुलज़ार साहब


ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी

खुदा से कहिये,कभी वो भी अपने घर आयें!

आज के लिए इतनी त्रिवेणिया काफ़ी है.. आगे और है.. इन्तेज़ार कीजिएगा.....