रूह देखी है ,कभी रूह को महसूस किया है ?  

Posted by: ranjana bhatia

गुलजार का लेखन क्यूँ इतना दिल के करीब लगता है ..क्यूंकि वह आम भाषा में लिखा होता है ..रूह से लिखा हुआ ..उनकी लिखी एक नज्म कितना कुछ कह जाती हैं ...

रूह देखी है कभी रूह को महसूस किया है ?
जागते जीते हुए दुधिया कोहरे से लिपट कर
साँस लेते हुए इस कोहरे को महसूस किया है ?

या शिकारे में किसी झील पे जब रात बसर हो
और पानी के छपाकों में बजा करती हूँ ट लियाँ
सुबकियां लेती हवाओं के वह बेन सुने हैं ?

चोदहवीं रात के बर्फाब से इस चाँद को जब
ढेर से साए पकड़ने के लिए भागते हैं
तुमने साहिल पे खड़े गिरजे की दीवार से लग कर
अपनी गहनाती हुई कोख को महसूस किया है ?

जिस्म सौ बार जले फ़िर वही मिटटी का ढेला
रूह एक बार जेलेगी तो वह कुंदन होगी

रूह देखी है ,कभी रूह को महसूस किया है ?

This entry was posted on Wednesday, June 18, 2008 . You can leave a response and follow any responses to this entry through the Subscribe to: Post Comments (Atom) .

4 comments

vakai...bemisaal hai gulzaar ji....

bahut badhiya.. superb..

वाह जी, गुलजार साहब का तो क्या कहना!!

यही तो जादू है गुलज़ार साहब का..

Post a Comment