आओ सारे पहन लें आईने  

Posted by: ranjana bhatia in

गुलजार के लिखे में जो सबसे अधिक पसंद आता है वह है उनकी त्रिवेणी का अंदाज़ ...चंद लफ्जों में खूबसूरती से बात कह जाना कोई आसान काम नही है ..उनके लिखे की समीक्षा करना भी आसान नहीं ..क्यों हर लफ्ज़ इन त्रिवेणी का लिखा अपनी बात अपने अंदाज़ से कहता है ....जैसे यह कुछ उनकी लिखी त्रिवेनियाँ

सामने आए मेरे देखा मुझे बात भी की
मुस्कराए भी ,पुरानी किसी पहचान की खातिर

कल का अखबार था ,बस देख लिया रख भी दिया


आओ सारे पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा

सबको सारे हंसी लगेंगे यहाँ !


उम्र के खेल में एक तरफ़ है ये रस्साकशी
इक सिरा मुझ को दिया होता तो इक बात थी

मुझसे तगड़ा भी है और सामने आता भी नहीं


कुछ अफताब और उडे कायनात में
मैं आसमान की जटाएं खोल रहा था

वह तौलिये से गीले बाल छांट रही थी


मैं रहता इस तरफ़ हूँ यार की दीवार के लेकिन
मेरा साया अभी दीवार के उस पार गिरता है

बड़ी कच्ची सरहद एक अपने जिस्मों -जां की है



ऐसे बिखरे हैं दिन रात जैसे
मोतियों वाला हार टूट गया

तुमने मुझे पिरो के रखा था


कोने वाली सीट पर अब दो कोई और ही बैठते हैं
पिछले चंद महीनो से अब वो भी लड्ते रहते हैं

कलर्क हैं दोनों, लगता है अब शादी करने वाले हैं


इतने अरसे बाद" हेंगर "से कोट निकाला
कितना लंबा बाल मिला है 'कॉलर "पर

पिछले जाडो में पहना था ,याद आता है


नाप के वक्त भरा जाता है ,हर रेत धडी में
इक तरफ़ खाली हो जब फ़िर से उलट देते हैं उसको

उम्र जब ख़त्म हो , क्या मुझ को वो उल्टा नही सकता ?

This entry was posted on Monday, February 16, 2009 and is filed under . You can leave a response and follow any responses to this entry through the Subscribe to: Post Comments (Atom) .

11 comments

एक एक त्रिवेणी बेशक़ीमती है.. गुलज़ार का जादू उनकी त्रिवेनियो में चरम पर होता है.. बहुत ही उम्दा पोस्ट..

एक एक को कई कई बार पढने का मन करता है

मैं रहता इस तरफ़ हूँ यार की दीवार के लेकिन
मेरा साया अभी दीवार के उस पार गिरता है

" किस किस का जिक्र करूं......बस लाजवाब "

Regards

ऐसे बिखरे हैं दिन रात जैसे
मोतियों वाला हार टूट गया

तुमने मुझे पिरो के रखा था

वाह...चुप हूँ पढ़ कर...क्या लिखूं अब...???सूरज को दीपक क्या दिखाना...

नीरज

behtareen.. lajawab...
issey jyada kya kahein ke " sab kuch kaha bhi nahi aur kuchchoda bhi nahi..

thank you so much for sharing.

हर त्रिवेणी शानदार है. समझ नहीं आता किसका ज़िक्र करूँ और किसका छोडूँ.

besudh ho jaate hai ,
hosh bhi kuchh kho jaate hai ..
alfaj hamare so jaate hai,
sapne bhi palkonse vapas chale jaate hai...
ye karishma teri kalam ka hai "gulzar" ham shabdome lipate afsaane ke didar karte hai ...

अजब इत्तफाक है गुलजार जी ये त्रिवेणी मैंने भी आज ही उनकी किताब "रात पश्मीने की" में पढी। उनके लिखे शब्दों में एक जादू होता है जो खींचकर ले जाता है। फिर से पढने को मिल गई।

janab gulzar shab aadab urdu adab me aapne tirveni sinf ka aagaz kar or malamal kardiya hai javab nahi is sinf ka ........ab.....kay kahun aapki shayri ka joasar......lafz nahi hai

बेहद शानदार।

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